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आखिर कौन है अफीम का खरीदार? क्या है कनेक्शन और अंतरराज्यीय तस्करी का जाल!

बलरामपुर:- छत्तीसगढ़ में लगातार सामने आ रहे अवैध अफीम खेती के मामलों ने अब कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। दुर्ग से लेकर बलरामपुर तक फैले इस नेटवर्क में झारखंड और बिहार कनेक्शन सामने आने के और अब रायगढ़ सबसे अहम सवाल यही है—आखिर इस अफीम का खरीदार कौन है और इसे खपाया कहां जा रहा है?

रायगढ़ जिले के तमनार थाना क्षेत्र के आमाघाट में अफीम की खेती पकड़ी गई, जहां झारखंड निवासी आरोपी को हिरासत में लिया गया। वहीं बलरामपुर जिले में भी 5 एकड़ तक फैली खेती, करोड़ों की जप्ती और कई आरोपियों की गिरफ्तारी इस में भी झारखंड व बिहार के लोग इस बात की ओर इशारा करती है कि मामला छोटे स्तर का नहीं, बल्कि बड़े नेटवर्क से जुड़ा है।

जानकारों की मानें तो अफीम का उपयोग सिर्फ नशे के लिए ही नहीं, बल्कि कानूनी तौर पर दवाइयों में भी किया जाता है। कफ सिरप से लेकर दर्द निवारक और नींद की गोलियों तक कई दवाओं के निर्माण में अफीम या उससे मिलने वाले तत्वों का इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि इसका एक वैध और नियंत्रित बाजार भी मौजूद है।

लेकिन यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—जब हर दवा और उसके कच्चे माल का पूरा हिसाब सरकार और दवा कंपनियों के पास होता है, तो फिर अवैध रूप से उगाई जा रही इतनी बड़ी मात्रा की अफीम आखिर कहां जा रही है?

छत्तीसगढ़ में शायद ही कोई ऐसा जिला हो, जहां पुलिस ने अवैध नशीली दवाओं या पदार्थों पर कार्रवाई न की हो। इससे यह संकेत मिलता है कि कहीं न कहीं अवैध सप्लाई चेन लगातार सक्रिय है। ऐसे में यह आशंका भी उठती है कि क्या कुछ दवाइयां चोरी-छिपे बनाई जा रही हैं? अगर ऐसा है, तो क्या उन कंपनियों या अवैध यूनिट्स को भी अफीम की जरूरत पड़ती है?

हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि लाइसेंस प्राप्त दवा कंपनियां सीधे तौर पर अवैध अफीम का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं, क्योंकि उन पर सख्त निगरानी और नियम लागू होते हैं। इसके बावजूद अवैध नेटवर्क दवा के नाम पर या नशे के बाजार में इसकी खपत कर सकते हैं।

पुलिस अब इस पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है। झारखंड और बिहार से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी के बाद यह साफ है कि नेटवर्क अंतरराज्यीय है। एसपी ने भी संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में और बड़े खुलासे हो सकते हैं।

अफीम पर सियासत तेज

अफीम के इस पूरे मामले को लेकर छत्तीसगढ़ में अब राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। विपक्ष जहां सरकार पर सवाल उठा रहा है, वहीं सरकार भी इस अनचाहे दाग से छुटकारा पाने की कोशिश में नजर आ रही है। लगातार सामने आ रहे मामलों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

पुलिस की साख पर भी सवाल

यह मामला अब केवल दुर्ग, बलरामपुर या रायगढ़ जिले तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रदेश स्तर के पुलिस अधिकारियों के लिए भी यह उनकी साख का सवाल बन गया है। चुनौती यह है कि आखिर इस संगठित नेटवर्क को पूरी तरह खत्म कर पुलिस अपनी विश्वसनीयता कैसे बनाए रखती है।

मध्यप्रदेश की घटना से बढ़ी चिंता

इन सभी सवालों के बीच मध्यप्रदेश की एक घटना भी लोगों के जहन में ताजा हो रही है, जहां कुछ महीनों पहले कफ सिरप के इस्तेमाल से कई बच्चों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद जब संबंधित दवा कंपनी के पते पर जांच शुरू हुई, तो मामला संदिग्ध और गड़बड़ निकला था क्या ऐसे दवा कम्पनी नशीले दवाओँ का अवैध व्यपार तो नही कर रहे हैं,

मध्यप्रदेश की उस घटना के बाद अब यह आशंका और गहरी हो गई है कि कहीं छत्तीसगढ़ आस पास में भी अवैध रूप से तैयार दवाइयों या नशे के कारोबार का ऐसा ही नेटवर्क तो सक्रिय नहीं है। फिलहाल पुलिस जांच जारी है, लेकिन जब तक खरीदार और सप्लाई चेन का पूरा खुलासा नहीं होता, तब तक यह सवाल बना रहेगा।

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